
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का पहला चरण आज 6 नवंबर (गुरुवार) को खत्म हुआ, मगर इसके बाद जो तस्वीर सामने आई, वो चुनावी ‘जश्न’ से ज्यादा ‘जंजाल’ जैसी लगी। कहीं EVM मशीनें छुट्टी पर चली गईं, तो कहीं गांव वालों ने वोट की जगह “रोड नहीं, वोट नहीं” का नारा लगा दिया।
फतुहा से शुरू हुआ ‘नो वोट डे’
पटना जिले की फतुहा विधानसभा सीट पर तो जमीन विवाद के चलते पूरा गांव ही नाराज़ हो गया। नतीजा — एक भी वोट नहीं पड़ा। प्रशासन ने समझाने की कोशिश की, BDO, CO, BPM सब पहुंचे,
लेकिन जनता बोली — “पहले ज़मीन दो, फिर वोट लो!”
दरअसल बिहार में विकास का वोटिंग से पुराना बैर है — सड़क बने तो जनता खुश, वरना EVM को “अनइंस्टॉल” कर देती है।
दरभंगा में ‘रोड नहीं, वोट नहीं’ का नारा
दरभंगा के कुशेश्वरस्थान प्रखंड के सुघराईन गांव में लोगों ने मतदान का बहिष्कार करते हुए सड़क निर्माण की मांग रखी। CO गोपाल पासवान और BDO प्रभा शंकर मिश्रा खुद मौके पर पहुंचे, पुलिस ने फ्लैग मार्च भी किया, लेकिन जनता बोली — “हम वोट नहीं, रोड चाहते हैं!”
सड़क की जगह अब गांव के रास्तों पर सिर्फ नारे गूंज रहे थे।
मुजफ्फरपुर में भी वोटिंग पर ब्रेक
गायघाट विधानसभा क्षेत्र के बूथ नंबर 161, 162 और 170 पर लोगों ने पुल और सड़क नहीं बनने से नाराज़ होकर वोटिंग नहीं की।
ग्रामीण बोले — “हर चुनाव में वादा मिलता है, सड़क नहीं।”
लगता है बिहार में वोट से पहले पक्की सड़क की गारंटी ही नया चुनावी मुद्दा बन गया है।
नालंदा में दिव्यांग वोटरों की मुश्किल
नालंदा से एक संवेदनशील खबर आई — यहां दिव्यांग मतदाताओं को कोई सुविधा नहीं दी गई, जिससे उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचने में कठिनाई हुई। ना व्हीलचेयर, ना वॉलंटियर, बस “अपने दम पर वोट डालो” वाली नीति चल रही थी।
एक दिव्यांग वोटर ने कहा — “वोट तो दे दिया, पर लोकतंत्र के रास्ते में बहुत गड्ढे हैं।”

EVM का मूड ऑफ़
चुनाव के दौरान कई बूथों पर EVM मशीनों ने काम करना बंद कर दिया। दानापुर, राघोपुर, मधेपुरा जैसे इलाकों में आधे घंटे तक वोटिंग रुकी रही। लगता है बिहार की मशीनें भी गर्मी और राजनीति दोनों से परेशान हो चुकी हैं।
चुनाव आयोग ने दी सफाई
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी विनोद सिंह गुञ्जियाल ने बताया कि
“कुछ जगह तकनीकी दिक्कतें आईं, लेकिन तुरंत नई EVM लगाई गईं।” उन्होंने अपील की — “लोग अधिक से अधिक संख्या में बाहर निकलकर मतदान करें।”
पर जनता कह रही है —“पहले EVM को जगाइए, फिर हमें बुलाइए।”
लोकतंत्र की यात्रा अभी कच्ची सड़क पर
पहले चरण की वोटिंग में जो नज़ारा सामने आया, वो बिहार के मतदाताओं की उम्मीदों और सिस्टम की सीमाओं दोनों को दिखाता है।
जहां जनता सड़क, सुविधा और सम्मान की मांग कर रही है, वहीं मशीनें और व्यवस्था अब भी रिपेयर मोड में हैं। पर जैसा कि बिहार में कहा जाता है — “धीरे-धीरे सब होई, लोकतंत्र भी पटरी पर आई।”
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